आत्महत्या एक आवेशित निर्णय

संसार में कौन सा मनुष्य ऐसा है जिसके पास समस्या नहीं हैं और कौन सी समस्या ऐसी है जिसका समाधान नहीं है। समाधान प्रत्येक समस्या का है बस जरूरत है उसे खोजने की कोशिश करते रहिए समाधान अवश्य मिलेगा।

जब विषम परिस्थितियों में फस जाता है मनुष्य।

हां,कभी- कभी मनुष्य ऐसी विषम परिस्थिति में घिर जाता है उसे समझ नहीं आता कि वह क्या करे लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि आत्महत्या के रास्ते को चुना जाए। वर्तमान समय में आत्महत्या जैसे हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति बनती जा रही है ये समस्या युवा वर्ग में अत्यधिक पाई जा रही है।

समाधान के रास्ते बहुत है ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं

समाधान के रास्ते बहुत होते हैं ।

परन्तु हमारा क्रोध और आवेश हमारे सोचने और समझने की शक्ति को क्षीण कर देते हैं,और हम आत्महत्या कर बैठते हैं।

जब कभी आप आत्महत्या करने के विषय में सोचें या सोच रहे हों तो रूकिए 

इससेपहले आप उस अदृश्य शक्ति (ईश्वर) के विषय में सोचें जो आपकी परीक्षा ले रहा है।उसने आपको जीवन आवश्य दिया है ।

हरसम्भव परिस्थिति में जीने के लिए किन्तु उसने आपको यह अधिकार नहीं दिया कि आप उसके द्वारा दिए गए अमूल्य धरोहर या उपहार को नष्ट करें।

वहअदृश्य शक्ति आपसे इसका हिसाब परलोक में लेगी। दुसरा आप उन लोगों के विषय में सोचें जो आपसे जुड़े हुए हैं आपमें जिनकी जान वसी है और सबसे महत्वपूर्ण बात उस समय थोड़ा रुक जाइए जिस समय आप आत्महत्या करने जा रहे हों।

अपने आवेश को नकारिए। जिस प्रकार चूल्हे पर हांडी से दुध अत्यधिक ताप होने के कारण निकल कर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार मन में आवेशरुपी ज्वाला के ताप से लिया निर्णय आपका जीवन रुपी दुध को नष्ट कर देता है । 

छोटी छोटी असफलताओं से नहीं हों निराश।

आपको एक कहानी बताती हूं एक लड़की ने बोर्ड परीक्षा दी । 

जबपरिक्षा का परिणाम आया तो वह फेल हो गई जबकि वह अच्छे अंक लाना चाहती थी।

परिणाम देखकर उसने निर्णय लिया कि वह अपने आप को समाप्त कर लेगी।

उसके पिता एक आफिस में काम किया करते थे। उसने अपने पिता से फोन कर के कहा-पापा, मैं फेल हो गई और मैं अब फेल का कलंक लेकर जीना नही चाहती, मैं मरने जा रही हूं।

पापा समझ गए कि बिटिया अभी आवेश में है वह किसी की नही सुनेगी। 

उन्होंनेकहा-बेटा तुम फेल तो हो ही गयी हो,दुनिया से भी अलविदा कहना चाहती हो तो मेरी आखिरी बात मान लो। लड़की ने सोचकर कहा-ठीक है बताओं। 

पापाबोले-बेटा,तुम अगले हफ्ते इसी दिन मरना अभी तुम्हारे नक्षत्र सही नहीं चल रहे हैं इस समय मरने से तुम्हें पीड़ा होगी।

अगर अगले हफ्ते मरोगी तो शान्ति से जाओगी।

बुरे वक्त को टालने में भलाई।

उन्हें केवल अपनी बेटी को इस बुरे कार्य से बचाना था । पिता के आग्रह करने पर बेटी मान गई और बोली- लेकिन पापा मैं मरूंगी जरूर। 

पापावोले-ठीक है। दिनों का क्रम बढ़ा पहले दिन लड़की का गुस्सा थोड़ा कम हुआ।

दुसरे दिन और कम हुआ इसी प्रकार हफ्ते के आखिरी दिन आते ही लड़की का मन बदल गया। 

फिरपापा ने आफिस पहुंचते ही फोन किया, पापा बोले-बेटा मैं काम में इतना व्यस्त हो गया कि तुम्हें बताना ही भूल गया आज तुम्हारे मरने के लिए बहुत अच्छा दिन है। बिटिया सब कुछ समझ गई और बोली-पापा शुक्रिया मुझे ये समझा ने के लिए कि मैं सिर्फ बोर्ड परीक्षा में फेल हुई हूं न कि जीवन परीक्षा में। पापा अपने मुझे फेल होने से बचा लिया।।।।।।

अपनों के बारे में भी सोचें।

इस तरह का कदम उठाने से पहले एक बार अपने परिवार, शिक्षक या मित्र के बारे में जरूर सोचें।अगर मन में कोई समस्या है तो उस समस्या को उनके साथ जरूर साझा करो । 

इससे भी पहले अपने बारे में जरूर सोचो क्योंकि हम किसी का कुछ नही मिटाते परन्तु अपनी जीवन रेखा मिटा लेते हैं ।

जैसे एक बार एक लड़के ने अपने पिता से क्लब जाने के लिए पैसे मांगे, पिता के इनकार कर देने से , लड़के ने आत्महत्या कर ली।

अब उससे कोई पूछे कि परलोक में कितना क्लब जा रहा है? जीवन के विषय में अधिक न सोचो , जिसने अब तक सहायता की है आगे भी सहायक रहेगा।

 

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SHAHANAJ KHAN

शहनाज़ खान दैनिक दृश्य की सह-संस्थापक एवं सम्पादक है इन्हें लिखने का शौक है। अपनी कविताओं को भी जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करुंगी। धन्यवाद

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