उम्मीदें

तुम मिल जाओ इस आशा में ,मन सावन की रिमझिम बारिश करता है , कितने    सावन    बीत   गये  , कितने  अभी  भी  बाकी  हैं । आसमान   से   कोई  तारा , टुटे   तो    बतला   देना , एक  मन्नत  मैं   मागूॅंगी  ,जो  सदियों  से  आधी  है। श्वेत   रंग-सा    रिश्ता   हो , तेरे   मेरे   सम्बन्धों   का , ये  रंग   रंगों   में   सच्चा , रंग   झूठे   सब   बाकी  है। जो कहा अभी वो सच है , सागर की लहरों सा , अपना जीवन उथल-पुथल रहा , और लोग कह रहे ये कहानी है। मैं भूल जाऊं ये मुमकिन कहां , तुम चले गए ये सच है क्या , मेरी सुनहरी रात हो तुम ,ये बातें जिन्दा है ना कि फ़ानी है।

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SHAHANAJ KHAN

शहनाज़ खान दैनिक दृश्य की सह-संस्थापक एवं सम्पादक है इन्हें लिखने का शौक है। अपनी कविताओं को भी जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करुंगी। धन्यवाद

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