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          ।   कुछ रंग ।

       ।   कुछ रंग ।

कुछ रंग आंगन में दे आए , कुछ रंग वहां से ले आए  हम थे ही इतने अलबेले , हंसते-गाते हम चले आए

कुछ धूमिल थे कुछ चमकीले रंग , कुछ श्वेत रंग          कुछ गहरे थे ,हम हर रंग में खुद को रंग लाए

कुछ रंग नफरत के थे देखें , कुछ में अथाह प्रेम भरा    हम दोनों हाथों में रंग लिए, उड़ान वहां से भर लाए

सूखे रंगों की ढेरों में ,  नयन नीर था मिला दिया मन हो गया हल्का ,     हम रंग में नीर को ऐसे मिला आए  

क्या खास है इसमें , हमको थोड़ा बतला दो तुम इन रंगों के हवनकुंड में , ताकि आहुति हम दे आए

पानी सा चंचल हृदय , कभी इधर कभी उधर चले थम गया आज ये घात लगी , फिर क्यों इसको पिघलाए।

कुछ रंग मौसम से सीखो , कुछ प्रकृति के कणों से मिलकर मिट्टी में , खुद को एक आकार दिलाओ

हर शाम तजुर्बे देती है , कुछ सीख नयी दे जाती है एक शिक्षक ही ये सुबह है , जो खींच नई उम्मीद लाए

हर रंग की अपनी महिमा है, इसको क्यों झूठलाओ तुम हर बात रंज की भूल के हम ,आओ गले मिल जाए

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SHAHANAJ KHAN

शहनाज़ खान दैनिक दृश्य की सह-संस्थापक एवं सम्पादक है इन्हें लिखने का शौक है। अपनी कविताओं को भी जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करुंगी। धन्यवाद

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