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  • June 18, 2021

मौसम चले जाते हैं

 

 

मौसम चले जाते है फिजाएं छोड़कर ।

रखतीं हूं जिनसे  उम्मीदें चले जाते हैं तोड़कर ।

 जिन्दगी रात की नींद होती है ।

हम खो देते हैं खुशियां हर रोज़ जानकर।

 कहानी एक जैसी सभी की होती है ।

कुछ वक़्त रहते हैं, चले जाते हैं सब किरदार छोड़कर ।

फूल हंसते हैं कहकर पत्थर को पत्थर।

,मगर बनती  हैं  मूर्तें  पत्थर को तोड़कर।

 मोहब्बत   सब   जताते   हैं   यहां।

 नफ़रत के साथ,नाम मोहब्बत का जोड़कर।

हमदर्द  भी  अजीबो-गरीब  मिलते हैं हमें।

जताते हैं हमदर्दी ज़ख्मों को नोचकर।

सफ़र में जो साथी मिल रहे हैं ।

वो भी एक दिन चले जाएंगे मुझे को छोड़कर।

खुद को मिटा भी लूं तो कैसे।

अभी और बाकी हैं दिलचस्प बातें।

जिन्दा हूं ये सोचकर।

हमारे भी पास होते कुछ टुकड़े आंसू के समन्दर के ,काश

 हम भी समा लेते अपने दर्दों को उसमें, जोड़कर ।

चलना ही पड़ेगा अपने लिए ए मुसाफिर ।

उठ खड़ा हो जा मन्जिल है सफ़र अपना ये सोचकर। ठोकरें जो मिले तुझे तो मत घबराना।

राह से भाग ना जाना कभी भी रूठकर।

माना सूरज चमक से रोशन करता ज़मीं को ।

मगर तुम रात के अंधेरे को ललकारना चांद बनकर। साबित कर ही देना इस सारे ज़माने को।

कि तुम रहते हो मस्ती में, परवाह ज़माने की छोड़कर।

मिलेगा नहीं मुझे रास्ता अपने मुकाम का ,ना पीछे हट जाना तुम ये सोचकर।

छोड़ेगा नहीं कसर बाकी कोई तुझको गिराने में , खड़े रहना तुम,भरनी है मुझे उड़ान ऊंची सोचकर।

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SHAHANAJ KHAN

शहनाज़ खान दैनिक दृश्य की सह-संस्थापक एवं सम्पादक है इन्हें लिखने का शौक है। अपनी कविताओं को भी जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करुंगी। धन्यवाद

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