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  • June 18, 2021

शायद ही आए फिर

शायद ही आए फिर

कुछ पैदल चलने दो मुझे को कहीं क़दम वहक ना जाए फिर

आज़ के पल पर हक़ मेरा जी लेने दो शायद ही कल आए फिर

ये मेरा है ,वो पराया है इस उलझन में जीवन की डगर बीत ना जाए फिर

आज़ साथ सभी तेरे ,कल चलना होगा अकेले जब चलना पड़ेगा अकेले तो, क्यों हम घबराएं फिर

छवि नैना में भर लेने दों आज़ सुनहरी यादों की कल मीठी बातें होंठों पर आएं या ना आएं फिर

बहुत रंज सहा जहां में अब तो खुश हो जाने दो मिली चन्द खुशियां जाकर वापस शायद ही आए फिर

बड़ी मशक्कत से निकले हैं गिरकर बंद मौत के दरवाजे हम पर खुल ना जाएं फिर

क्या खूब लिखा किसी शायर ने -लिख जाने दो ग़ज़लें कल अल्फाज़ याद आएं ना आएं फिर

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SHAHANAJ KHAN

शहनाज़ खान दैनिक दृश्य की सह-संस्थापक एवं सम्पादक है इन्हें लिखने का शौक है। अपनी कविताओं को भी जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करुंगी। धन्यवाद

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