नैतिक शिक्षा की शुरुआत प्राथमिक विद्यालय से ही होती है।

बच्चों में अपनी नैतिक जिम्मेदारी की भावना को विकसित करने की पहली जिम्मेदारी होती है। नैतिक शिक्षा के प्रति जागरूक करने की जो अवस्था है वो है बाल्यावस्था है। यही वो अवस्था है जो बच्चों में अपने नैतिक मूल्यों को स्थापित करने की और उन्हें विकसित करने की उम्र होती है।

प्राथमिक विद्यालयों में प्रतिदिन बच्चों को इस विषय पर जागरुक करने के उद्देश्य से नियमित बीस मिनट तक शिक्षकों के निर्देशन में विद्यालयों में कार्य किया जाता है।

जिससे बच्चों में अपने जीवन शैली में बदलाव भी देखने को मिलता है। प्राथमिक विद्यालयों मिली नैतिक शिक्षा बच्चों को भविष्य में अपने नैतिक जिम्मेदारी को निभाने की अहम भूमिका निभाती है।

नैतिक शिक्षा ही बच्चों में अपने कार्य के प्रति जागरूक एवं जिम्मेदार बनाती है। नैतिक शिक्षा से बच्चों का मानसिक रूप से मजबूत किया जा सकता है। नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में सक्षम बनाती नैतिक शिक्षा।

अभी पिछले दिनों मेरी व्हाट्स ऐप बॉल में एक वीडियो देखा जिसमें विद्यालय के बच्चों के हाथों में झाड़ू दिखाई दे रही थी बच्चे अपने विद्यालय में सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने में लगे हुए थे।इसको लेकर स्थानीय जन-प्रतिनिधि ने आपत्ति जताई। ये आपत्ति किसी राजनीतिक दृष्टिकोण से थी सायद उनके लिए नैतिक शिक्षा के बारे में जानकारी नहीं मिली हो। यदि विद्यार्थी विद्यालय परिसर में झाड़ू लगा भी रहें हैं तो यह कार्यक्रम स्वच्छ भारत अभियान के तहत नैतिक शिक्षा से जुड़े मुल्यों पर आधारित है।इसको राजनैतिक द्वेष भावना से किसी अध्यापकों पर आरोप लगाना कि किताबो की जगह बच्चों को झाड़ू थमा दिया। ऐसे लोगों से अपील है कि

ऐसी खबरों को सनसनीखेज नहीं बनानी चाहिए सनसनीखेज बनाने के लिए क्षेत्र में और भी समस्याएं हैं जिनके लिए आप सनसनीखेज बना सकते हैं। अगर आप खबरें सनसनीखेज बनाना चाहते हैं तो विद्यालयों में और भी प्रमुख समस्याएं हैं जिनके लिए आप सनसनीखेज मामला बना कर अपनी क़लम को धार दे सकते हैं।

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