• About Us Dainik DIRASHYA
  • Contact Us
  • Privacy Policy
  • Terms And Conditions/Dainik dirashya
  • October 25, 2021

जंग – ए – आज़ादी के सबसे बड़े क्रांतिकारियों में से एक अल्लामा फ़ज़ल हक़ खैराबादी رضي الله عنه , जिनके योगदान को इतिहास के पन्नो से मिटा दिया गया

जंग – ए – आज़ादी के सबसे बड़े क्रांतिकारियों में से एक अल्लामा फ़ज़ल हक़ खैराबादी رضي الله عنه , जिनके योगदान को इतिहास के पन्नो से मिटा दिया गया।

इस बात को हर हिंदुस्तानी जानता हैं कि अंग्रेजों ने भारत की ख़ूबसूरत फिजा में ऐसा जहर घोला कि चारों तरफ जुल्म ओ सितम का दौर शुरू हो गया ।

अंग्रेजों ने गुलामी में हिंदुस्तानी को इस तरह जकड़ा कि लोग हर तरफ डरे और सहमे नज़र आते थे, मगर हमारे कई सारे वीरों को उस गुलामी का एहसास भी हुआ। जिसके बाद उन वीरों ने 1857 में पहला स्वतंत्रता संग्राम संग्राम छेड़ दिया, उस 1857 की क्रांति में कई ऐसे क्रांति वीर हुए, जिन्होंने इस जंग-ए-आज़ादी में अपना योगदान दिया और इतिहास में अमर हो गए, उसी में कुछ क्रांतिकारी ऐसे भी थे जो गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गए ।

उन्हीं में से एक थे अल्लामा फज़ले हक खैराबादी  رضي الله عنه

फज़ले हक खैराबादी  رضي الله عنه

तो आइए जानते हैं, इन्होंने 1857 की ग़दर में कैसे अंग्रेजों के दांत खट्टे किए :-

ब्रिटिश हुकुमत दिन ब दिन हिंदुस्तानियों को जुल्म और लूट-मार जैसे भयानक उपद्रव से प्रताड़ित करती रही, हद तो तब हो गई जब अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों को धर्म का सहारा लेकर एक दूसरे से लड़ाना चाहा, हालांकि उनकी ये चाल कामयाब न हो सकी लिहाजा 1857 की क्रांति छिड़ गई, जो हिंदू – मुस्लिम एकता का प्रतीक बनी ।

इसके बाद क्रांतिकारियों ने इस विद्रोह को सफल बनाने के लिए दिल्ली में बैठे बहादुर शाह जफ़र से संपर्क किया। हिंदुस्तान के लिए लड़ाई के एक आह्वान को उन्होंने सर आखों पर रखते हुए क्रांतिकारियों को मदद का आश्वासन दिया और अल्लामा फजले हक खैराबादी رضي الله عنه को वापस दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा ।

मौलाना खैराबादी  رضي الله عنه  ने जामा मस्जिद में जुमा की नमाज़ के बाद अंग्रेजों के खिलाफ फतवा दिया और मुसलमानों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का फरमान जारी किया उनके इस फतवे का बहुत गहरा असर हुआ, जो होना लाजमी भी था । मौलाना फजले हक खैराबादी رضي الله عنه के इस फतवे ने 1857 की क्रांति को तैयार किया।

ऐसा माना जाता है कि मौलाना के इस फतवे को उस वक़्त के कुछ अख़बारों ने प्रकाशित भी किया था, जिसने व्यापक तौर पर मुसलमानों को जंगे आज़ादी में कूदने के लिए उत्साहित भी किया। हालांकि 1857 की क्रांति में हर धर्म के मानने वाले क्रांतिवीरों ने भाग लिया था और कहा जाता है कि स्वतंत्रता सेनानियों की वीरता को देखते हुए अंग्रेजों के नीचे से जमीन खिसक गई थी। खैर, किन्ही कारणों से 1857 की क्रांति सफल नहीं हो सकी और ब्रिटिश हुकूमत ने दिल्ली पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया।

मौलाना पर जिहाद का फतवा देने व 1857 से 1858 के बीच क्रांतिकारी नेता होने और दिल्ली, अवध और अन्य क्षेत्रों के लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने व हत्या के कई संगीन आरोप लगे कहा जाता है कि मौलाना पर खुली अदालत में मुक़द्दमा चलाया गया था और इस मुकद्दमे में उन्होंने अपना कोई भी वकील नियुक्त नहीं किया था, बल्कि खुद अपने मुक़दमे पर बहस की साथ ही ये भी कहा जाता है कि इस मुक़द्दमे में जज भी मौलाना का शागिर्द था। वह मौलाना से हमदर्दी भी रखता था । गवाहों ने भी अल्लामा फजले हक खैराबादी رضي الله عنه  को पहचानने से इंकार कर दिया ।

ऐसा माना जाता है कि मौलाना के पास अपने आपको निर्दोष साबित करने का पूरा मौक़ा था । लेकिन इन्होंने झूठ बोलने से इंकार कर दिया, और भरी अदालत में अपना जुर्म कबूल करते हुए कहा कि

“हाँ वह फतवा सही है वह मेरा ही लिखा हुआ था और आज भी मैं इस फतवे पर कायम हूं।”

आरोपों को कुबूल करने के बाद उन्हें काला पानी की सजा सुनाई गई और इसके साथ ही सारी जायदाद जब्त करने का भी हुक्म जारी कर दिया गया, और इस तरह से 1857 की क्रांति का एक हीरो पूरी तरह से गुमनामी के अंधेरे में चला गया ।

अल्लामा फजले हक खैराबादी رضي الله عنه  ने जेल के अंदर अपने साथियों पर किस तरह से जुल्म ढाए गए और उन्हें किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, ये सब अपनी किताब ‘अस्सौरतुल हिंदिया’ में किया है, जो मुफ़्ती इनायत उल्लाह ककारेवी के माध्यम से उनके बेटे मौलाना अब्दुल हक के पास पहुंची थी।

ऐसा माना जाता है कि कोयले से लिखे कई कागजों को जोड़कर इस किताब को बनाया गया था । जिसका बाद में “बागी हिंदुस्तान” के नाम से अनुवाद भी किया गया हालांकि, अल्लामा को छुड़वाने के लिए उनके बेटे शमशुल हक ने कोशिश भी की और रिहाई का लेटर लेकर जब वह अंडमान पहुंचे, तभी उन्हें एक जनाज़े की भीड़ दिखाई पड़ी पूछने पर पता चला कि यह जनाज़ा तो उनके अब्बू अल्लामा फज़ले हक खैराबादी رضي الله عنه  का है ।

और आज अल्लामा फज़ले हक़ खैराबादी  رضي الله عنه को इतिहास के पन्नो से मिटा दिया है, और यह सब हम लोगों की वजह से हुआ है, सत्ता के लिए भूखे राजनैतिक दल इतिहास को अपने हिसाब से मोड़ रहे हैं और हम लोग ऐसा होते हुए देख रहे हैं, हमें अपने क्रांतिकारियों के बारे में जानना होगा, ताक़ि लोगो द्वारा गढ़ी गयी झूठी अफ़वाहों से बचा जा सके ।

Share and Enjoy !

Shares

अब्दुल वहाबी

Student of Politics | Writer | Activist | AMU Co-editer Dainik Dirashya

Read Previous

Bihar Budget: Education gets the biggest part of the budget, with Rs 38,035 crore set aside for 2021-22.

Read Next

अमरगढ़ पंजाब नेशनल बैंक प्रबंधक वेदराम सिंह के खिलाफ एनसीआर दर्ज।

6 Comments

  • Bahoot umda likha hai bhai

    • आप ऐसे ही हमें अपना फ़ीड बैक देते रहे। धन्यवाद

  • Bahut hi shandar post likhi hai Bhai 👌🏻
    Ismein aap books aur newspaper ke reference bhi dijiye taaki log wahan jaakar aur bhi knowledge gain Kar sken
    Allah ta’ala aap ko is kaam ke liye behtreen ajr a’ta farmaye!!!!

    • शुक्रिया भाई ❤️❤️

    • आपके सुझाव पर हमारे सहयोगी ज़रूर तव्वजो देंगे। आपके सहयोग से ही ये सब कर पा रहें हम हमेशा पूरी कोशिश करेंगे कि आपकी उम्मीदों पर खरे उतरें।

    • Ek nyi jankari ek nye yodha kai sath ….Bhut sahi likha hai.. Hum sabhi ise padkar or logo ke bare me bhi sochenge jo itihas me khi gum ho gye hai.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares