मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो

मेरे    नवनीत    स्वप्न , मेरी  बंजर  भूमि  की फसल , ऐसे  मुझको  मिले  तुम हो , मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो ।

मेरे  आगे  बढ़ने  का  सफ़र , शुरू और  आखिरी  मंजिल

, मेरा  जो कुछ,वो तुम ही हो , मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो। अन्धकार  में रोशनी की किरण ,कर  एक  सूर्य  का  वरण , मैं पृथ्वी, स्वामी तुम हो , मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो ।

जिसने अपनों का छोड़ शहर ,कर एक अनजान की  मदद , वो  अनजाने  से  तुम  हो , मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो। माटी  से  सोना  बना  दिया , जीवन  को   सुन्दर  बना  दिया , वो तुम नहीं, तो फिर कौन तुम हो , मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो।

मेरा सुन्दर और विशाल मन , हृदय में स्थित सुगंधित उपवन ,  मेरे चेहरे पर मुस्कराहट के खलिहान तुम हो , मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो।

मेरे प्रातः काल का स्मरणीय वर्णन , खिलती  हुई  धूप का उदगम , बिखरी पड़ी ओस का संगम तुम हो , मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो।

मेरे सायंकाल के प्रज्ज्वलित दीप ,मेरी  सुनहरी  निशा  के  चन्द्र , हर अन्धकार में ज्योति बनकर आए तुम हो । मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो।

भटके राही को मिलें राह ,हर ख्वाहिश पूरी चाह , मेरी तो सारी हसरतें तुम हो , मेरे जीवन का आधा हिस्सा तुम हो।

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SHAHANAJ KHAN

शहनाज़ खान दैनिक दृश्य की सह-संस्थापक एवं सम्पादक है इन्हें लिखने का शौक है। अपनी कविताओं को भी जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करुंगी। धन्यवाद

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