• About Us Dainik DIRASHYA
  • Contact Us
  • Privacy Policy
  • Terms And Conditions/Dainik dirashya

शहीदी दिवस पर विशेष  भगतसिंह , सुखदेव और राजगुरु  का शहीदी दिवस

राजगुरू सुखदेव भगत सिंह

शहीदी दिवस पर विशेष:

भगतसिंह ,सुखदेव और राजगुरु  का शहीदी दिवस।

आज भगतसिंह , सुखदेव और राजगुरु के अदम्य साहस और बलिदान का दिन है।आज ही के दिन 23 मार्च 1931 की शाम को 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह और उनके दो अन्य साथियों राजगुरु और सुखदेव को ब्रिटिश सरकार द्वारा फांसी पर चढ़ा दिया गया था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे वीर योद्धा थे । जिनकी बलिदान के समय महज़ आयु 23 वर्ष थी। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के युवा शहीद थे। आइए जानते हैं भारत मां के तीन बहादुर ,साहसी और बलिदानी योद्धाओं के विषय में———-

  ———————सुखदेव——————-

वीर बहादुर सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था। सुखदेव थापर 15 मई 1907 को पंजाब ,(लुधियाना) में पैदा हुए थे। सुखदेव थापर ने लाला लाजपत राय का बदला लिया था। इन्होंने भगत सिंह को मार्गदर्शन दिखाया था। सुखदेव भगत सिंह के समान ही बचपन से स्वतंत्रता का सपना पाले हुए थे। भगत सिंह और सुखदेव “लाहौर नेशनल कालेज” में छात्र थे। दोनों पंजाब में ही पैदा हुए और पंजाब में ही साथ शहीद हो गए। सुखदेव भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी थे उनकी शहादत को आज भी संपूर्ण भारत में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

     ——-शिवराम हरि “राजगुरू”——–

शिवराम हरी राजगुरु का जन्म पुणे जिले के खेड़ा नामक गांव में सन् 1908 को हुआ था। 6 वर्ष की आयु में इनके पिता का देहांत हो गया। छोटी सी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने और संस्कृत सीखने के लिए आ गये। यहीं पर इनका परिचय अनेक क्रांतिकारियों से हुआ। चन्द्रशेखर आजाद से ये इतने प्रभावित हुए कि इन्होंने तत्कालीन उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन से जुड़ गए।’” सांडर्स” का बंद करने में राजगुरु ने भगत सिंह और सुखदेव का पूरा पूरा साथ दिया था।‘ भगत सिंह , सुखदेव के साथ ही इन्हें भी लाहौर जेल में फांसी पर लटका दिया गया।

————–भगत सिंह——-—–

भगतसिंह ,भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिकारी थे। भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर ,सन् 1907 में पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम सरदार किशनसिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। इन्होंने नेशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़ कर नौजवान भारत सभा की स्थापना की।  भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को को एक साथ ब्रिटिश जूनियर पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या के जुर्म में फांसी पर लटका दिया गया।

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान——-

“उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए जफ़ा क्या है ?                                                                  हमें यह शौक है देखें, सितम की इंतहा क्या है?     दहर से क्यों खफा रहें, चरखा क्या ग़िला करें ।   सारा जहाॅं अदू सही,आओ! मुकाबला करें।।

इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चंद्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात की समय जलती हुई मोमबत्ती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खाई थी कि उनकी जिंदगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी कसम पूरी कर दिखाई।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं, एक हुकूमत, जिसका दुनिया के इतने बड़े हिस्से पर शासन था। इसके बारे में कहा जाता था कि उनके शासन में सूर्य कभी अस्त नहीं होगा। इतनी ताकतवर हुकूमत को 23 साल के लड़के ने हिला कर रख दिया।

“मैं जोर देकर कहता हूं कि मेरे अंदर भी अच्छा जीवन जीने की महत्वाकांक्षा और आशाएं हैं लेकिन मैं समय की मांग पर सब कुछ छोड़ने को तैयार हूं और यही सबसे बड़ा त्याग है”-

                                                भगतसिंह सरदार

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु  ने मिलकर लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लिया। साइमन कमीशन द्वारा चलाई गई लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय को लाठियों से मार मार कर घायल कर दिया था जिससे उनकी मृत्यु हो गई। भगत सिंह को इस घटना में झकझोर कर रख दिया। 

उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़ फेंकना था। उन्हें आजादी का बुलंद सपना साकार करना था। इस उद्देश्य में भगत सिंह का सहयोग सुखदेव और राजगुरु ने दिया।

भगतसिंह , राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर,१९२८ को राय के दोषी स्टाॅक को मारने गये परंतु गलती से लाहौर में सहायक पुलिस अध्यक्ष रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे०पी० सांडर्स  मार गिराया और असेंबली में बम फेंक दिया परंतु वह वहां से भागे नहीं जिस कारण भगत सिंह और उनके साथी गिरफ्तार हो गए।

26 अगस्त 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129,302तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा120के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया गया। 7 अक्टूबर 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया जिसमें भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु कोफांसी की सजा सुनाई गई। फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद लाहौर में धारा 144 लागू कर दी गई।

राजगुरू सुखदेव भगत सिंह

भगत सिंह से अंतिम इच्छा पूछी गई तो उन्होंने “रिवाॅल्युशनरी लेनिन” किताब पढ़ने की इच्छा जताई। भगत सिंह जी एक और अंतिम इच्छा थी जो इच्छा बनकर ही रह गई। वह इच्छा उन्हें घर का भोजन करने की थी ।उन्होंने फांसी के 1 दिन पहले लाहौर सेंट्रल जेल के सफाई कर्मचारी बेबे से घर का भोजन लाने की अपील की परंतु इनकी फांसी का समय बदल जाने के कारण (कर सुबह की जगह उसी दिन की शाम कर दी गई) बेबे उनकी यह अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर पाई। जेल के अध्यक्ष ने भगत सिंह से पूछा देश के लिए कोई अंतिम संदेश देना चाहोगे। तब भगत सिंह ने कहा-सिर्फ दो, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद इंकलाब जिंदाबाद।

पूरी जेल में सन्नाटा पसरा हुआ था साथी गुनगुनाती चले आ रहे थे 

“कभी वह दिन भी आएगा कि जब आजाद हम होंगे यह अपनी ही जमीन होगी यह अपना आसमां होगा”

 23 मार्च सन् 1931 की शाम में 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह और उनके दो साथियों सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी पर लटका दिया । हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ शामिल हुए

इंकलाब जिंदाबाद!

Share and Enjoy !

0Shares
0

SHAHANAJ KHAN

शहनाज़ खान दैनिक दृश्य की सह-संस्थापक एवं सम्पादक है इन्हें लिखने का शौक है। अपनी कविताओं को भी जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करुंगी। धन्यवाद

Read Previous

    विश्व गौरैया दिवस : खतरे में है गौरैया

Read Next

          ।   कुछ रंग ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

0Shares
0